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कोसी प्रमंडल (बिहार) से प्रकाशित इस प्रथम दैनिक ई. अखबार में आपका स्वागत है,भारत एवं विश्व भर में फैले यहाँ के तमाम लोगों के लिए यहाँ की सूचना का एक सशक्त माध्यम हम बनें, यही प्रयास है हमारा, आपका सहयोग आपेक्षित है... - सम्पादक

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मंगलवार

पूर्व सांसद आर.पी. यादव का निधन


73 वर्ष की आयु में मधेपुरा के पूर्व सांसद राजेन्द्र प्रसाद यादव का निधन दिल्ली के एम्स में हो गया, वे लीवर कैंसर से पीड़ित थे। उन्होंने कांग्रेस से अपनी राजनीति आरम्भ की थी तथा तीन बार मधेपुरा से सांसद निर्वाचित हुए थे। 1967 में वे बीपी मंडल जैसे कद्दावर नेता को हरा कर सांसद बने। पुनः 1977 एवं 1980 में डा. रमेन्द्र कुमार यादव ‘रवि’ को पराजित कर अपनी राजनीति-फलक का विस्तार किया। वे निधन पूर्व तक जद यू. के सम्मानित नेता रहे।

मंगलवार

दिल्ली मे बिहार उत्सव

अगर आप बिहार के बारे में ज्यादा जानना चाहते हैं तो दिल्ली के प्रगति मैदान में चले आईये। यहां आपको बिहार की पिछले चार साल की विकास यात्रा की पूरी जानकारी मिलेगी। केवल यही नहीं राज्य की पिछले ९७ वर्षों की लंबी यात्रा के साथ बिहार की स्वर्णिम एतिहासिक धरोहारों सहित यहां की विभिन्न हस्त और शिल्प कलाओं से भी रूबरू हो सकेंगे।

आप बिहार के विश्व प्रसिद्ध लिट्टी चोखा या दूसरे व्यंजनों का स्वाद लेना चाहते हैं तो आपको इसके लिए कहीं और जाने की जरूरत नहीं है। इसकी व्यवस्था भी उत्सव मंडप के बाहर ही की गई है। इसकी व्यवस्था पटना में स्थित होटल मौर्य शेरेटन द्वारा की गई है। यहां आने वाले दर्शक विभिन्न वस्तुओं की खरीदारी भी कर सकते हैं। वह भी एक दम सही दामों पर। नई दिल्ली के प्रगति मैदान में सोमवार से १५ दिवसीय बिहार उत्सव शुरू हुआ है। इसका आयोजन पांच अप्रैल तक किया जाएगा। यहां के हॉल संख्या १५ में राज्य की मधुबनी कला, टिकुली कला, पुस्तक प्रदर्शनी और रंगारंग कार्यक्रमों का आयोजन किया जा रहा है। इन सबके माध्यम से प्रदेश के आर्थिक, सामाजिक और दूसरे क्षेत्रों में आए बदलावों को प्रदर्शित किया गया है।

राजधानी में आधी आबादी पूर्वांचल और बिहार की है। राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र के बड़े शहरों में भी बिहार और पूर्वांचल के लोग भारी संख्या में रहते हैं। इन सभी लोगों के लिए अपने बिहार को और नजदीक से जानने-समझने का मौका आया है। राज्य में चल रही अक्षर आंचल योजना, मुख्यमंत्री सेतु योजना, बालिका पोशाक योजना सहित तमाम नई योजनाओं के द्वारा बिहार राज्य के विकास की कहानी दर्शायी गई है। जो लोग पिछले दो-तीन साल से बिहार नहीं गए। उन्हें निश्चित तौर पर अब बिहार बदला हुआ नजए आएगा। यहां हथकरघा और हस्तशिल्प की आकर्षक कलाकृतियां देखने को मिल रही हैं। मोतीहारी की सीप से बने आभूषण, जूट से बने आभूषण आदि यहां आने वालों को पहले ही दिन से खूब लुभा रहे हैं।

बिहार औद्योगिक क्षेत्र के बारे में विस्तार से बताया जा रहा है। बियाडा की प्रमुख अंशुली आर्य ने बताया कि बिहार उत्सव देखने आने वालों के लिए प्रगति मैदान के गेट संख्या ७ और १० से प्रवेश निःशुल्क रखा गया है। उन्होंने बताया कि निवेशकों के लिए बिहार में अच्छे अवसर मिल रहे हैं। उत्सव में इसकी जानकारी भी उपलब्ध रहेगी।
(नई दुनिया,दिल्ली,23.3.2010 में पूनम की रिपोर्ट)

शुक्रवार

नकल न करने देने पर मधेपुरा मे बवाल


















(हिंदुस्तान,पटना,19.3.2010)
प्रस्तुतकर्ता का फिल्म विषयक ब्लॉगः www.filmcrossword.blogspot.com

मंगलवार

तीसरी कसम मे गुलाबबाग की यादें

भारतीय संस्कृति की उत्सवधर्मिता का चटक रंग मेले के रूप में बिहार भी बिखरा पड़ा है। इन रंगों ने जीवन को तो गति दी ही, हाट और मेले से जुड़ी अर्थव्यवस्था ने बिहार के अभ्युदय को भी बल प्रदान किया। मेलों के इस देस में हर ओर जीवन-संस्कृति के कोरस गाये जाते हैं। अंग प्रदेश का विषहरी गीत, कोसी के हिस्से में गाया जाने वाला भगैत, मध्य बिहार की कजरी, मिथिला का समा चकेबा, सब जीवन गीत ही तो हैं। बिहार में मेलों की परंपरा अति प्राचीन है। कहते हैं कि गया के पितृपक्ष मेले का इतिहास वैदिक काल से जुड़ा है। श्रावणी मेला की ऐतिहासिकता स्वयंसिद्ध है। पूर्णिया के गुलाबबाग मेले की यादें तो तीसरी कसम फिल्म में स्थिर चित्र के रूप में संजोयी गयी है। बांका का मंदार मेला, अंग प्रदेश की समृद्ध संस्कृति का आज भी वाहक है। मधेपुरा के सिंहेश्र्वर स्थान मेले का जुड़ाव रामायण काल से है। सोनपुर के पशु मेले की ख्याति अब वैश्विक है। कार्तिक पूर्णिमा के मौके पर गंगा और गंडक तट पर लगने वाले इस मेले से बिहार की बड़ी पहचान है।
तीसरी कसम में पूर्णिया के गुलाबबाग मेले की यादें जिन लोगों ने फिल्म देखी होगी, उनकी स्मृति में जरूर बनी होंगी। आंचलिक उपन्यासकार फणीश्र्वर नाथ रेणु की कृति पर बनी इस फिल्म में इसका फिल्मांकन है। गुलाबबाग मेले का उत्स अब 100 साल पूरा कर चुका है। कभी पीसी लाल ने इसकी शुरुआत पूर्णिया सिटी में की थी। मेले का प्रचार-प्रसार इतना अधिक हुआ कि भीड़ काफी बढ़ने लगी और जगह कम पड़ने लगी। इसके बाद इसे गुलाबबाग में लगाया जाने लगा। प्रत्येक वर्ष कार्तिक माह में लगने वाले इस मेले में विभिन्न प्रजाति के पशु-पक्षी की खरीद-बिक्री होती थी। लेकिन अब यह क्रम थोड़ा कमजोर हुआ है। इस मेले में नौटंकी कंपनियां, थियेटर, जादू के खेल का हर साल जादू छाया रहता था। बिहार ही नहीं, नेपाल व पश्चिम बंगाल के लोग भी एक माह तक लगने वाले इस जमघट का आनंद उठाने यहां पहुंचते थे। सोनपुर मेले की बराबरी का यह उत्सव अब पूर्णिया पूर्व प्रखंड प्रशासन की पहल पर हाल तक आयोजित होता रहा है। लोगों को उम्मीद है कि यह और भी सुविधासंपन्न होकर संव‌र्द्धित होगा। बिहार में जिस प्रकार पर्यटकों की संख्या में वृद्धि हो रही है, उससे गुलाबबाग के लोगों का भी हौसला बढ़ा है और कोशिश जारी है कि यह मेला अपने पुराने गौरव को फिर से हासिल करे।
(दैनिक जागरण,मुजफ्फरपुर संस्करण,16.3.2010)
प्रस्तुतकर्ता का ब्लॉग: www.krraman.blogspot.com

रविवार

‘पटना कलम’ बिहार के सांस्कृतिक परिदृश्य का साक्षी




पटना कलम’ वर्ष 2 अंक 6 एवं 7 जनवरी -फरवरी 2010 के दो अंक मनोहारी ही नहीं, बिहार की समृद्धि के सूचना-भंडार भी हैं। जनवरी अंक में कुचीपुड़ी नृत्य में गजग्राह के दृश्य का मंचन , गायक पं. वेंकटेश का निनाद उत्सव में भागीदारी, लोक नृत्यों की राज्यस्तरीय प्रतियोगिता तथा युवाओं को शास्त्रीय संगीत का पाठ सहित इसी अंक में मुख्यमंत्री की राजगीर यात्रा -आत्मगौरव की तलाश का सम्पूर्ण  सचित्र  विवरण बिहार की सांस्कृतिक समृद्धि की सूचक है।
इसी प्रकार फरवरी 2010 का अंक भी कम उपयोगी नहीं है। अंक में 15 वां राष्ट्रीय युवा उत्सव में बिहार का जलवा, 19 वाँ पटना थियेटर फेस्टिवल , मंच पर उमराव जान, पटना में पंकज उदास, हरि उप्पल को पद्मश्री आदि रपट पढ. कर बिहार के लोगों का गर्वोन्नत हो जाना स्वभाविक है। इसी अंक में गणतन्त्र की धरती वैशाली  में मुख्यमंत्री की यात्रा एवं कार्यक्रम की लम्बी रपट पढ़ कर महसूस किया जा सकता है कि सरकार पुरातात्विक स्थलों के संरक्षण एवं उनके उत्तरोत्तर विकास के लिए कितनी सचेष्ट है।
  पटना कलम
प्रधान संपादक
विवेक कुमार सिंह
सलाहकार संपादक
विनोद अनुपम

बुधवार

बूंद का सागर में तव्दील होने की कहानी का नाम है ‘कविता कोसी’




‘कविता कोसी’शॄंखला की पाँचवी कड़ी अभी प्रकाशित हुई है। इस खंड में सात वरिष्ठ रचनाकारों की रचनाएँ प्रकाशित की गयी है। - तेजनारायण ‘तेज’, सुकदेव नारायण, गणेश चंचल, भुवनेश्वर प्रसाद गुरमैता, छेदी पंडित, महेश्वर प्रसाद सिंह और मधुकर गंगाधर की प्रतिनिधि कविताएँ प्रस्तुत की गयी है। इन रचनाकारों के वस्तुनिष्ठ परिचय और छयाचित्र पुस्तक के अन्त में ‘परिचय परिशिष्ठ’ के अन्तर्गत दिए गये हैं। इन रचनाकारों पर डा. कामेश्वर पंकज द्वारा समालोचनात्मक आलेख भी आरंभ मे दिये गये हैं।
‘कविता कोसी’ की इस श्रॄंखला को सजाते-सँवारते पांचवे मुकाम पर लाने का सारस्वत प्रयास किया है देवेन्द्र कुमार देवेश (उपसंपादकः साहित्य अकादमी, नई दिल्ली) ने, इस  श्रॄंखला को प्रस्तुत करते हुए देवेश जी ने अपने जोश और जुनून को जिस लक्ष्य तक पहुँचाया है वह सर्वथा स्तुत्य है। पूर्व के चार खंडों में कोसी अंचल की साहित्यिक विरासत का आकलन करते हुए वे चैंतीस रचनाकारों से सम्बन्धित सूचनाएँ और उन्नीस रचनाकारों की काव्य रचना की बानगी प्रस्तुत कर चुके हैं , इन कवियों में सुरेन्द्र स्निग्ध, उत्तिमा केशरी, शांति यादव, मंजुश्री वात्सायन, कल्लोल चक्रवर्ती, वरुण कुमार तिवारी, हरिशंकर श्रीवास्तव ‘शलभ’, जोगेश्वर जख्मी, हरि दिवाकर, भूपेन्द्र नारायण यादव ‘मधेपुरी’ लीलारानी शवनम, नीरद जनवेणु, सुबोध कुमार ‘सुधाकर’ सहित अन्य कवि संकलित हैं।
‘कविता कोसी’ के सभी खंडों में - कोसी नदी, कोसी अंचल की भौगोलिक, ऐतिहासिक, सांस्कृतिक पहचान को रेखांकित करने के साथ-साथ साहित्यिक विरासत को पुरजोर ताकत से प्रस्तुत किया है। पंचम खंड की तमाम कविताएँ पगडंडियों से महानगर तक की यात्रा करती है।
अपनी अदम्य जिजीविषा की बदौलत डा. देवेश ने कोसी की कोमल-कठोर अनुभूतियों का वृहतर संकलन ‘कविता कोसी’ श्रॄंखला के रूप मे पेश किया है वह पठनीय एवं सौ फीसदी संग्रहणीय है, विशेषकर विश्व भर में फैले यहाँ की बड़ी आबादी के लिए।

प्रकाशक- अनिता पंडित, गाजियाबाद, उ.प्र. मोबाइल- ०९८६८४५६१५३