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कोसी प्रमंडल (बिहार) से प्रकाशित इस प्रथम दैनिक ई. अखबार में आपका स्वागत है,भारत एवं विश्व भर में फैले यहाँ के तमाम लोगों के लिए यहाँ की सूचना का एक सशक्त माध्यम हम बनें, यही प्रयास है हमारा, आपका सहयोग आपेक्षित है... - सम्पादक

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बुधवार

खुद की पीड़ा बांटने का प्रयास है ‘एक थी गीता’

‘एक थी गीता’ जवाहर किशोर प्रसाद की सरल-सहज बोलचाल की भाषा में रचितएक अत्यन्त संवेदनात्मक लघु-उपन्यास है। घनीभूत मानवीय संवेदना और करुणा के भाव से सिंचित यह उपन्यास रिश्तों की आत्मीयता को दर्शाता है। खास बात यह भी है कि इस रचना के कथा-क्रम में नायक की उपस्थिति गहरे रोमांचित करता है। ऐसा लगता है कि लेखक के पास रिश्तों के भावनात्मक चढ़ाव-उतार की समझ बूझ का एक समृद्ध अतीत है। शायद तभी नैसर्गिक प्रेम के रंगों को विरह-मिलन की कूची से कई प्रकार की प्रेम कहानियों की तस्वीरें पेश करने में इन्हें को असुविधा नहीें होती। अपने अनुभव, अनुभूतियों एवं कल्पनाओं की जीवंत रेखाओं से रचे कथानक में जो प्रतिविम्ब बनता है, वह बिल्कुल अपना-सा लगता है।
                                     - रामबहादुर कुमर (प्राचार्य) भागलपुर।

‘एक थी गीता’ सत्य घटना पर आधारित समाज की सच्ची कहानी है, जहां कथा-नायक यदा-कदा कहानी में उपस्थित होकर अपने दार्शनिक विचारों को संप्रेषित करता है, किन्तु बार-बार वह आकर कहानी से बाहर हो जाता है, स्वयं टिक नहीं पाता है, जिससे यह पता चलता है कि वह पात्रों के बीच रहकर अपने दुःखों में शामिल होना तो चाहता है किन्तु असह्य पीड़ा को देख नहीं सकने के कारण अपने दार्शनिक पुट छोड़कर प्लाट से बाहर हो जाता है।
    ‘एक थी गीता’  की कथा-वस्तु हमारे समाज की एक ऐसी अनकही कहानी है जो रोज-रोज घटती है हमारे सामने, किन्तु हम उन्हें अपनी जुबान पर लाने से हमेशा ही कतराते हैं।
                                                     - अशोक कुमार ‘आलोक’
                             संपादक- 'अर्य संदेश', मोबाइल- 9709496944.
लेखक- जवाहर किशोर प्रसाद
संपर्कः माधुरी प्रकाशन, सिपाही टोला, चूनापुर रोड, पूणिया - 854301
मोबाइल- 9905217237/9973264550.

   

अन्तःप्रेरणा की अभिव्यक्ति है कविता संग्रह ‘किसलय’

साहित्य में अच्छी संभावनाओं का नाम है डा. सुवंश ठाकुर ‘अकेला’ है। पचास कविताओं का संग्रह ‘किसलय’ नाम को सार्थक करता है। यह महज संयोग नहीं कि वाणी-वन्दना से प्रारंभ जीवन के सत्य जो साहित्य का भी सत्य है श्मशान पर पड़ाव डालती है कविता। बीच के सफर में शिव भी है, सुन्दर भी है।
    कविताओं की भाषा सरल, भाव-गंभीर है।
    श्री अकेला के ‘दो शब्द’ ने मुझे अधिक प्रभाविता किया है कि ये अपनी हांकने वाले कवि नहीं हैं। निन्दा, स्तुति, पाठकों के विवेक पर छोड़कर ये केवल कविताएं लिखते हैं। ‘किसलय’ के बारे में किसलय की ही ये दो पंक्तियां
उद्धृत कर मैं आश्वस्त हूँ कि इस छोटे-से शहर पूर्णिया का यह कवि नामवर होगा।
     ‘किसलय की शोभा न्यारी है,
    हर मनुज मात्र को प्यारी है।’’

 उम्र में ‘अकेला’ से बड़ा हूँ। सो, यशस्वी होने का आशीर्वाद देता हूँ
                                                    - भोलानाथ आलोक, पूर्णिया

पुस्तक से कविता की बानगी-
         सुकरात सरीखा जहर मिले
        शूली ईसा सा पा जायें
        हिरण्यकशिपु सा पिता मिले
        जाति मिले रैदास की         
        घोर यातना मीरा जैसी
        हो जाऊँ कबीरा सा फक्कड़

        ......
        .......
लेखक- डा. सुवंश ठाकुर ‘अकेला’
संपर्कः माधुरी प्रकाशन, सिपाही टोला, चूनापुर रोड, पूणिया - 854301
मोबाइल- 9905217237 / 9973264550.

शुक्रवार

‘कोशी तीर के आलोक पुरूष’ एक खोजपूर्ण साहित्यक अवदान - सुधाकर


‘कोशी तीर के आलोक पुरूष’ कोशी के संवेदनशील, बहुचर्चित तथा स्थापित साहित्यकार, कई गवेष्णात्मक साहित्य के रचयिता एवं साहित्य के पुरोधा श्री हरिशंकर श्रीवास्तव ‘शलभ’ का सद्यः प्रकाशित ग्रन्थ है। इसके पूर्व ‘मधेपुरा के स्वाधीनता आन्दोलन का इतिहास, ‘शैवअवधारणा और सिंहेश्वर’, ‘मंत्रद्रष्टा ऋष्यशृंग’ तथा ‘कोशी अंचल की अनमोल धरोहर’ एवं ‘अंग लिपि का इतिहास’ जैसे खोजपूर्ण साहित्य अवदान, शलभजी साहित्य’जगत को दे चुके हैं। इन ऐतिहासिक तथा सांस्कृतिक ग्रन्थों के पश्चात ‘कोशी तीर के आलोक पुरूष ’ नामक यह अनमोल ग्रन्थ, शलभजी का समीक्षार्थ सामने है, जिसमें संत शिरोमणि परमहंस लक्ष्मीनाथ गोस्वामी, संत कवि जाॅन क्रिश्चन, पुलकित लाल दास ‘मधुर’, बलेन्द्र नारायण ठाकुर ‘विप्लव’, मो. कुदरतुल्लाह कालमी, कमलेश्वरी प्रसाद मंडल तथा कार्तिक प्र0 सिंह के व्यक्तित्व एवं कृतित्व पर गवेष्णात्मक एवं खोजपूर्ण प्रकाश डाला गया है।
    विद्वान लेखक ने अपने ‘दो शब्द’ में लिखा है कि ‘इसके अलावा भी इस क्षेत्र में ऐसे कई पुरूष-रत्न हुए हैं, जिन्हें अब तक प्रकाश में नहीं लाया जा सका है। कोशी अंचल के इतिहास एवं सांस्कृति के अनुसंधाता एवं रचनाकार के लिए यह अपराध बोध जैसा लगता है। मैंने तद्विषयक अपने पूर्व ग्रन्थ, ‘कोशी अंचल की अनमोल धरोहरें तथा प्रस्तुत ग्रन्थ ‘कोशी तीर के आलोक पुरूष’ में इससे उबरने का लघु प्रयास भर किया है। मेरा यह प्रयास कितना सफल है, सुधी पाठक ही निर्णय ले सकते हैं। इस परिपेक्ष्य में मेरा यह मानना है कि ‘कोशी तीर के आलोक पुरूष’ नामक यह ग्रन्थ ऐसे आलोक पुरूष को आलोकित तथा प्रोद्भाषित करने में सक्षम है, जिन्हें यह जमाना भुलाने की चेष्टा कर रहा है।
    आलोच्य ग्रन्थ बहुत ही ऐतिहासिक तथा सांस्कृतिक रत्नों को उजागर करने वाला है। तदर्थ , साहित्य-जगत् में ऐसे गवेष्णात्मक तथा ऐतिहासिक ग्रन्थ का अभिनन्दन होना चाहिए।
पुस्तक की छपाई तथा बंधाई बहुत आकर्षक तथा नयनाभिराम है।  
लेखकः  श्री हरिशंकर श्रीवास्तव ‘शलभ’, अशेष मार्ग, लक्ष्मीपुर मुहल्ला, मधेपुरा (बिहार),पिन-852113
प्रकाशक- समीक्षा प्रकाशन, जे.के. मार्केट, छोटी कल्याणी, मुजफ्फरपुर (बिहार) मूल्य- 150/-रूपये
समीक्षकः सुबोध कुमार ‘सुधाकर’ , सम्पादक, ‘क्षणदा’ (त्रैमासिक)
    प्रभा प्रकाशन, त्रिवेणीगंज (सुपौल) बिहार, पिन-852139

रविवार

दिवंगत कवि चंचल को साहित्यकारों ने दी श्रद्धांजलि ।

सहरसा / 18.11.11
कोसी अंचल के वयोवृद्ध कवि दिवंगत गणेश चंचल को श्रद्धांजलि अर्पित करने साहित्यकारों का एक दल डा. गोविन्द प्रसाद शर्मा के नेतृत्व में ग्राम सोहा (सोन बर्षा) आया एक भव्य समारोह में दिवंगत कवि को श्रद्धा सुमन अर्पित हुए समारोह के अध्यक्ष तथा सोहा ग्राम के साहित्यानुरागी एवं दिवंगत कवि के मित्र श्री गणेश प्रसाद सिंह ने दिवंगत कवि के व्यक्तित्व एवं कृतित्व पर प्रकाश डालते हुए कहा कि कवि चंचल जन्मजात कवि थे एवं मरने तक कविकर्म जुटे रहे। समारोह को संबोधित करते हुए मधेपुरा से आये वरिष्ठ साहित्यकार हरिशंकर श्रीवास्तव ‘शलभ’ ने कहा कि कवि चंचल की रचनाओं में गीत काव्य के वे सारे गुण थे जो उत्तर छायावाद के बाद हिन्दी कविताओं में पाये जाते हैं कवि चंचल एक सधे हुए नवगीत सहित कविता की अन्य विधाओं के सिद्धहस्त कवि थे। साहित्यकार शलभ ने उनकी काव्यकृति ‘पुष्करणी’ ‘गांधी गाथा’, ‘त्रिपर्णा’ आदि की कई कविताओं को संदर्भित करते हुए उनके काव्यगुण की चर्चा की। डा. गोविन्द प्रसाद शर्मा ने अपने साथ दिवंगत कवि के सानिध्य संबन्धी अनेक स्मरण प्रस्तुत किए। इस अवसर पर डा. अशोक कुमार वर्मा, महेन्द्र बंधु, चंद्रशेखर पौद्धार, श्रीकांत वर्मा ‘विभू’ अवधेश कुमार अवध, मुख्तार आलम, श्यामानंद लाल दास एवं मधेपुरा से आये कवि अरविन्द श्रीवास्तव ने अपनी कविताओं के द्वारा श्रद्धा सुमन अर्पित किए।

गुरुवार

भारतीय सांस्कृतिक चेतना में नई जान फूकने वाले युगद्रष्टा थे टैगोर

विचार व्यक्त करते- डा. रामलखन सिंह यादव, अपर जिला सत्र न्यायाधीश, मधेपुरा
विश्वकवि रवीन्द्रनाथ टैगोर ने देश और विदेश के सारे साहित्य दर्शन संस्कृति आदि को आत्मसात कर अपने भीतर समेट लिए थे। साहित्य की शायद ही कोई ऐसी शाखा है जिसमें उनकी रचना न हो। ये उदगार कौशिकी क्षेत्र हिन्दी साहित्य सम्मेलन, मधेपुरा के अम्बिका सभागार में गीतांजलि के दार्शनिक एवं मानवीय पक्ष को दर्शाते हुए मुख्य अतिथि के रूप में अतिरिक्त जिला एवं सत्र न्यायाधीश डा. रामलखन सिंह यादव ने व्यक्त किया। डा. यादव ने यह भी कहा कि विश्व के ऐसे एकमात्र कवि हैं जिसकी दो रचनाएं दो राष्ट्रों के राष्ट्रगान हैं । वह नोबेल पुरस्कार पाने वाले एशिया महादेश के प्रथम व्यक्ति थे । इसके पूर्व समारोह के अध्यक्ष हरिशंकर श्रीवास्तव ‘शलभ’ ने विषय प्रवेश करते हुए कहा कि टैगोर बांग्ला साहित्य के माध्यम से भारतीय सांस्कृतिक चेतना में नयी जान फूंकने वाले युगद्रष्टा थे। मनुष्य और ईश्वर के बीच जो चिरस्थायी संबन्ध है, वह अलग-अलग रूपों में रवीन्द्र की रचनाओं में उभर कर सामने आया है। उनकी गीतांजलि विश्व साहित्य की एक अनमोल धरोहर है तथा रवीन्द्र संगीत बंगला संगीत का अभिन्न अंग है। विशेष अतिथि के रूप में डा. देवाशीष बोस ने विस्तार से महाकवि के पारिवारिक परिवेश, व्यक्तित्व एवं कृतित्व पर प्रकाश डाला, सम्मेलन के सचिव डा. भूपेन्द्र नारायण यादव ‘मधेपुरी’ ने कहा कि इस महान शिक्षा शास्त्री ने वैदिक युग के नालंदा और विक्रमशिला के समान शांति निकेतन की स्थापना की । प्रकृति के अनन्य पुजारी कवींद्र रवीन्द्र ने गांधी जी को महात्मा का विशेषण दिया। इसके अतिरिक्त डा. विनय कुमार चैधरी, दशरथ प्रसाद सिंह , तुलसी पब्लिक स्कूल के निदेशक श्यामल कुमार आदि ने अपने-अपने विचार व्यक्त किये। 
  कार्यक्रम का आरंभ श्रीमती मंजू घोष के रवीन्द्र संगीत से हुआ। कार्यक्रम के द्वितीय सत्र में सुकवि परमेश्वरी प्रसाद मंडल ‘दिवाकर’ की स्मृति में आयोजित काव्य गोष्ठी का संचालन दशरथ प्रसाद सिंह ‘कुलिश’ ने किया डा. राम लखन सिंह यादव, डा. भूपेन्द्र मधेपुरी, डा. आलोक कुमार, डा. विनय कुमार चैधरी, संतोष सिन्हा, उल्लास मुखर्जी, श्यामल कुमार, मयंक जी, मशाल जी, प्रो. शचीन्द्र आदि कवियों ने भाग लिया। डा. आलोक कुमार ने धन्यवाद ज्ञापन किया। 

शनिवार

कोसी अंचल के वयोवृद्ध कवि गणेश चंचल नहीं रहे !


दिनांकः 5 नवम्बर, 2011
कोसी अंचल के गीतकारों में गणेश चंचल का विशिष्ट स्थान रहा है। वे गहन अनुभूति के कवि थे। इनका जन्म: 1930, ग्राम- सोहा, जिला - सहरसा में हुआ था। उन्होंने पन्द्रह वर्ष की उम्र से ही काव्य लेखन किया और दीर्घकाल तक लिखते रहे, बच्चों के लिए भी साहित्य रचा एवं सांस्कृतिक गतिविधियों में सक्रिय रहे। इनकी प्रकाशित कृतियों में - स्वतंत्रता का शंखनाद (गीत संग्रह, 1945) गांधी गाथा (पद्यमय जीवनी, 1948, पुनर्मुद्रणः 2008), त्रिवेणी तरंग (कविता संग्रह, 2004), स्रोतस्विनी (कविता संग्रह, 2006), त्रिपर्णा (2010) इस चर्चित कवि-गीतकार के निधन (5 नवम्बर, 2011) से कोसी क्षेत्र के साहित्य को अपूरणीय क्षति हुई है। इनकी कविता को स्मरण करते हुए इन्हें श्रद्धा निवेदित है -
 लग रहा है आ रहा हूँ, शीघ्र तेरे पास,
 पूर्ण होने जा रहा है, चिर प्रतीक्षित आस,
 मिल रहा हर पल कि तेरा सूक्ष्मतम संकेत,
 जग रहा है विकल मन में, एक मृदु उल्लास।

                                      - गणेश चंचल