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कोसी प्रमंडल (बिहार) से प्रकाशित इस प्रथम दैनिक ई. अखबार में आपका स्वागत है,भारत एवं विश्व भर में फैले यहाँ के तमाम लोगों के लिए यहाँ की सूचना का एक सशक्त माध्यम हम बनें, यही प्रयास है हमारा, आपका सहयोग आपेक्षित है... - सम्पादक

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रविवार

प्रतिभा का सम्मान


तिहास के पन्नों में राजशाही और जमींदारों की बर्बरता और क्रूरता के किस्से भरे परे हैं। लेकिन कई ऐसे अपवाद इतिहास से निकलकर सामने आते हैं तो मन कौतूहलता से भर जाता है। मधेपुरा में मिले इतिहास के एक सुनहरे साक्ष्य को बांटने से नहीं रोक पा रहा हूँ । इस महत्वपूर्ण साक्ष्य (तस्वीर में दिख रहे) को सहेजने वाले प्रशांत कुमार (अधिवक्ता, व्यवहार न्यायलय, मधेपुरा) एवं इस सदर्भ में विस्तृत सूचना उपलब्ध कराने वाले डा. भूपेन्द्र ना यादव ‘मधेपुरी’ का आभार व्यक्त करना चाहूंगा ! प्राप्त जानकारी अनुसार एकदेश्वर सिंह दरभंगा महराज के शंकरपुर स्टेट के जमींदार थे उनकी लोकप्रियता जनहित के कार्यों एव शिक्षा के प्रति उनकी प्रतिवद्धता से झलकती है। उनदिनों मधेपुरा की एकमात्र शिक्षण संस्थान ‘दी सीरीज इन्स्टीट्यूट’ (स्थापित- 1896 ई., मधेपुरा) से इन्ट्रेंस परीक्षा में प्रथम आने वाले छात्र को वे प्रतिवर्ष स्वर्ण पदक प्रदान किया करते थे। शिक्षा के प्रति उनके अनुराग को यह पदक दर्शाता है। यह पदक बाबू रासबिहारी लाल मंडल (मुरहो स्टेट) के दामाद शालीग्रामी निवासी श्री रघुनंदन प्रसाद के 1905 – 06 वर्ष की इंट्रेंस परीक्षा में प्रथम आने के उपलक्ष्य में जमींदार एकदेश्वर सिंह के द्वारा प्रदान किया गया था।


सोमवार

केन्द्रीय राज्य मंत्री श्री हरीश रावत ने किया ‘अमर शहीद मुंशी साह‘ का लोकार्पण

ई दिल्ली, वयोवृ़द्ध स्वतंत्रता सेनानी और राजनीतिक, सामाजिक कार्यकर्ता श्री नरेश पोद्दार द्वारा लिखित पुस्तक ‘अमर शहीद मुंशी साह‘ का लोकार्पण माननीय केन्द्रीय राज्य मंत्री श्री हरीश रावत, कृषि, खाद्य प्रसंस्करण, उद्योग और संसदीय कार्य मंत्रालय, भारत सरकार ने 22 फरवरी 2012 को अपने आवास पर किया। यह पुस्तक 1942 की अगस्त क्रांति में भागलपुर (बिहार) में शहीद हुए स्वतंत्रता सेनानी मुंशी साह की संक्षिप्त जीवनी प्रस्तुत करने के साथ-साथ उत्तरी बिहार में तत्कालीन स्वतंत्रता-संग्राम संबंधी गतिविधियों का तथ्यात्मक विवरण प्रस्तुत करती है। इस अवसर पर सर्वश्री सुरेश पोद्दार, कैप्टन रामफूल शर्मा, डा. कमलेश कुमार, ओमप्रकाश पोद्दार, प्रणव प्रसाद पोद्दार और पुस्तक के लेखक श्री नरेश पोद्दार उपस्थित थे।

गुरुवार

दिल्ली के मंच पर मधेपुरा की गूंज


ई दिल्ली. कोसी की मिट्टी की ताकत सिर्फ बाढ़ लाने और विभीषिका तक सीमित नहीं है बल्कि इसकी मिट्टी में रचनात्मकता भी है. पिछले दिनों दिल्ली सरकार द्वारा आयोजित गणतंत्र दिवस काव्य उत्सव में कोसी की माटी के शब्द राष्ट्रीय राजधानी में गूंजे. मधेपुरा के गाँव आनंदपुरा में पले-बढे युवा कवि विनीत उत्पल राष्ट्रीय राजधानी दिल्ली के उस मंच से अपनी कविताओं का पाठ किया, जिस मंच पर इनके अलावा मैथिली और भोजपुरी के करीब बीस कवि मौजूद थे. उन्होंने काव्य उत्सव के खुले मंच से 'बेटी' नामक कविता पेश की जो कोसी में आई विभीषिका और मां को लेकर था.
मैथिली और भोजपुरी में काव्य उत्सव का आयोजन दिल्ली सरकार की मैथिली-भोजपुरी अकादेमी ने किया था. दिल्ली के मंडी हाउस स्थित श्रीराम भारतीय कला केंद्र में आयोजित इस काव्य उत्सव का उद्घाटन दिल्ली सरकार में भाषा, महिला और बल विकास मंत्री डा. किरण वालिया ने किया था. मैथिली में कविता पाठ करने वालों में विनीत उत्पल के अलावा मानवर्धन कंठ, अग्निपुष्प, कुमार राधारमण, शेफालिका वर्मा, रामलोचन ठाकुर, विवेकानंद ठाकुर, और रवींद्र लाल दास थे, वहीं भोजपुरी में अनिल ओझा 'नीरद', कमलेश राय, परिचय दास, अविनाश, रचना योगेश, रवींद्र श्रीवास्तव जुगानी, मनोज भावुक, तारकेश्वर मिश्र राही, ज्ञानेंद्र कुमार सिंह, रमाशंकर श्रीवास्तव ने अपनी कविता पेश की.
 विनीत उत्पल का जन्म पूर्णिया जिले के सुखसेना ग्राम में हुआ है और उनका पैत्रिक ग्राम मधेपुरा के उदाकिशुनगंज प्रखंड के आनंदपुरा ग्राम है. उनका शुरूआती बचपन सैनिक स्कूल, तिलैया में बीता. उनकी पढाई-लिखाई मुंगेर जिले के तारापुर और रणग्राम में हुई है. उन्होंने भागलपुर स्थित मारवाड़ी कालेज में पढाई की है और तिलकामांझी भागलपुर विश्वविद्यालय से स्नातक की डिग्री हासिल की है. बाद में उन्होंने दिल्ली के जामिया मिल्लिया इस्लामिया से जनसंचार और भारतीय विद्या भवन से अंग्रेजी में पत्रकारिता की डिग्री ली. उन्होंने गुरु जम्भेश्वर विश्वविद्यालय से जनसंचार में मास्टर की डिग्री भी हासिल की है. हिंदी, अंग्रेजी और मैथिली में विपुल लेखन करने वाले विनीत की एक मैथिली कविता संग्रह 'हम पुछैत छी'' दिल्ली से प्रकाशित हुई है. उन्होंने साहित्य अकादमी से पुरस्कृत वरिष्ठ साहित्यकार उदयप्रकाश की कहानी मोहनदास का मैथिली अनुवाद भी किया है. विनीत उत्पल मारवाड़ी कालेज, भागलपुर के गणित विभाग के पूर्व अध्यक्ष और गणितज्ञ डा. वेदानन्द झा के सुपुत्र हैं.

मंगलवार

सहरसा में बाल श्रमिक उन्मूलन एवं विभिन्न श्रम अधिनियमों का एक दिवसीय कार्यशाला आयोजित


हरसा। सहायक श्रमायुक्त कार्यालय के पार्श्व में आयोजित बाल श्रमिक उन्मूलन एवं विभिन्न श्रम अधिनियमों का एक दिवसीय कार्यशाला की अध्यक्षता कोसी अंचल के वरिष्ठ साहित्यकार हरिशंकर श्रीवास्तव ‘शलभ’ ने की कार्यक्रम में सहरसा जिले के प्रखण्ड प्रमुख एवं मुखिया बहुलांश में उपस्थित थे। कार्यक्रम का आरंभ करते हुए डा. अरविन्द श्रीवास्तव ने कवि राजेश जोशी की कविता ‘बच्चे काम पर जा रहे हैं’ शीर्षक से की उन्होंने कहा कि बच्चों का सुबह होतेे ही काम पर जाना किसी भी राष्ट्र का पतनावस्था की ओर ले जाने का द्योतक है उन्हें खेलने, तितलियों के साथ दौड़ने तथा पाठशाला व मदरसों में पढ़ने का सुनहरा अवसर प्रदान किया जाय जिससे वे राष्ट्र का कर्णधार बन सकें।
    समारोह में श्रमप्रवर्तन पदाधिकारी साीता राम मंडल, श्यामल किशोर सिंह, लक्ष्मी प्रसाद, प्रफुल्ल कूमार दास एवं पूनम लता सिन्हा ने बाल श्रम उन्मूलन कानून की व्याख्या करते हुए उपस्थित प्रमुख एवं मुखिया से अपेक्षित सहयोग करने की अपील की । जिला मुखिया संध के अध्यक्ष डा. प्राण मोहन सिंह, मुखिया गजेन्द्र नारायण यादव, मुखिया जयशंकर जी ‘पप्पु’, मुखिया राजेश कुमार ‘रजनीश’ ने  बाल श्रम उन्मूलन पर अपने-अपने विचार रखे। अधिवक्ता श्री जैन ने बाल श्रम पर संवैधानिक प्रावधानों की जानकारी दी। बचपन बचाओ आन्दोलन के निदेशक घूरन महतो एवं सामाजिक कार्यकर्ता संजीव कुमार सिंह ने इस क्षेत्र में हुई उपलब्धि का विवरण प्रस्तुत किया। अध्यक्ष ने सभी उपस्थित श्रोताओं से अपील की कि जिस जलपान गृह अथवा होटल में बाल श्रमिक पाये जाय वहाँ जलपान अथवा भोजन न करेने का संकल्प लें तथा उस संस्था में उपस्थित बाल मजदूरों की सूचना संवद्ध अधिकारियों को त्वरित दें। सहायक श्रमायुक्त डा. आनन्द ने धन्यवाद ज्ञापन कर कार्यशाला का समापन किया।

रविवार

शिवनेश्वरी बाबू हमेशा अपने कर्मों में जीते रहेंगे - डा. रवि

विधि विशेषज्ञ, साहित्यकार एवं समाजिक सरोकार में गहरी अभिरूचि रखने वाले तथा हिन्दी को न्यायालय में प्रतिष्ठापित करने वाले पूर्व लोक अभियोजक व वरीय अधिवक्ता शिवनेश्वरी प्रसाद के निधन से मर्माहत साहित्यकारों एवं अधिवक्ताओं ने कौशिकी क्षेत्र हिन्दी साहित्य सम्मेलन के अम्बिका सभागार में एक श्रद्धांजलि सभा का आयोजन किया। जिसकी अध्यक्षता करते हुए वरिष्ठ साहित्यकार हरिशंकर श्रीवास्तव ‘शलभ’ ने कहा कि उनका ‘सोवियत रूस में 14 दिन’ यात्रा विषयक उल्लेखनीय ग्रंथ है तथा ‘समाजिक न्याय के द्वंद’ उनके स्वतंत्र चिंतन का प्रमाणिक दस्तावेज, श्री शलभ ने उन्हें अपना मित्र, दार्शनिक व मार्गदर्शक कहा।
    सम्मेलन के सचिव भूपेन्द्र नारायण यादव ‘मधेपुरी’ ने कहा कि वे बहुमुखी प्रतिभा के धनी तथा दया, करुणा व ममता की मूरत थे। डा. मधेपुरी ने उन्हें साहित्य समर्पित साधक बताते हुए कहा कि न्यायालयों में हिन्दी को प्रतिष्ठापित करने वाले उस महानायक के सतत प्रयासों को मधेपुरा सदा याद करेगा।
    इस अवसर पर पूर्व सांसद एवं मंडल विश्वविधालय के संस्थापक कुलपति डा. रमेन्द्र कुमार यादव ‘रवि’ ने उनके जीवन वृत की विस्तृत चर्चा करते हुए कहा कि ‘सदा हँसने वाले दादा श्री शिवनेश्वरी प्रसाद वर्षों में नहीं बल्कि हमेशा अपने कर्मों में जीते रहेंगे। इस अवसर पर पूर्व प्रतिकुलपति डा. के. के. मंडल, कुलानुशासक डा. एच. के. मंडल, प्राचार्या शांति यादव, प्राचार्य प्रो. सच्चिदानंद, प्रो. श्यामल किशोर यादव, डा. आर. क.े पी. रमण एवं डा. रामचन्द्र प्रसाद यादव आदि ने विस्तार से शोकोदगार व्यक्त किये।
    श्रद्धांजलि सभा में बुद्धिजीवियों एवं छात्रों की काफी उपस्थिति रही अधिवक्ता जवाहर झा, दिलीप झा, इंदूवाला सिन्हा, दशरथ सिंह, डा. विनय चैधरी, डा. रामेश्वर प्रसाद, डा. सुरेश भूषण, उल्लास मुखर्जी, सिद्धेश्वर काश्यप, इप्टा सचिव सुभाष चन्द्र एवं तुलसी पब्लिक स्कूल के निदेशक श्यामल कुमार प्रमुख थे। कार्यक्रम का संचालन डा. मधेपुरी एवं धन्यवाद डा. आलोक कुमार ने किया।

मंगलवार

‘सोवियत रूस में चौदह दिन’ नहीं रहे इस पुस्तक के लेखक- शिवनेश्वरी प्रसाद !


धेपुरा के जाने-माने विधिवेत्ता, समाज सेवी एवं विद्वान शिवनेश्वरी प्रसाद (जन्म: 1.1.1927.) का निधन सोमवार 26.12.2011. को हो गया। वे लगभग साठ वर्षों से साहित्य, समाज, राजनीति एवं लोक कल्याण के कार्यों में सक्रिय रहे। वे ‘भारत-सोवियत सांस्कृतिक सहयोग समिति’- इस्कस के मधेपुरा इकाई के सचिव तथा प्रतिष्ठित साहित्यिक संस्था ‘कौशिकी क्षेत्र हिन्दी साहित्य सम्मेलन’ के संरक्षक भी थे  साथ ही दीर्धकाल तक मधेपुरा जिला न्यायालय में लोक अभियोजक भी रहे। उन्होंने अपनी सोवियत संध की यात्रा का विवरण अपनी पुस्तक ‘सोवियत रूस में चौदह दिन’ में लिखा। इसके अतिरिक्त ‘सामाजिक न्याय के अंतर्द्वंद’ तथा ‘न्यायालयों में आरक्षण के उठते सवाल’ विषयक ग्रंथ की भी रचना की। 
  हिन्दी साहित्य के संवर्द्धन को ध्यान मे रखते हुए उन्होंने न्यायालय का सारा कार्य आजन्म हिन्दी में ही किया। उनके निधन से मधेपुरा ने एक महान सामाजिक एवं सांस्कृतिक शख्सियत को खो दिया।

शनिवार

साहित्यिक विधाओं का विपुल संसार है ‘साँवली’ - डा. उत्तिमा केशरी

हिन्दी की साहित्यक लघु पत्रिकाओं में ‘सांवली’ अपनी प्रतिबद्धता, वैचारिकता और सर्जनात्मक प्रभावों से जानी जाती है। महज 3 वर्ष: 6 अंकांे के बदौलत बिना किसी फतवेबाजी और विमर्श के यह पत्रिका पाठकों के मध्य अपनी जगह बहुत तेजी से बना रही है। यह पत्रिका समर्थ रचनाकारों के अतिरिक्त अपने अंचल के साथ सुदूर नए लेखकों को स्पेस दे रही है। इस पत्रिका का प्रधान संपादक जवाहर किशोर प्रसाद बेहद इमानदारी और गहरी संलग्नता के साथ अपने संपादक त्रेय के माध्यम से संपादन कर रहे हैं यह प्रधान संपादक के कुशल नेतृत्व का परिचय है।
    इस अंक में कहानियाँ कई हैं, उनमें - डा. सरला अग्रवाल, रमेश कुमार रमण, डा. सुवंश ठाकुर ‘अकेला’, सूर्यकांत निराला, कुमार शर्मा ‘अनिल’ अपनी संवेदनात्मक उपस्थिति दर्ज कराती है। आलेख स्तंभ में ‘मंदार-दर्शन’ , पद्मा धर्म-पत्नी थी, कोसी-शोध साहित्य संदर्भ, आधुनिक हिन्दी लेखकन के क्रमशः लेखन- संजीव रंजन, अनन्त, देवेन्द्र कुमार देवेश व अनिरूद्ध सिन्हा की उपस्थिति पाठकों को अच्छी लगेगी। कविताएँ, गीत, गज़ल की उपस्थिति भी अच्छी है। आशा विश्वास, स्नेहलता, डा. लीला रानी ‘शबनम’, डा. भूपेन्द्र नारायण यादव ‘मधेपुरी’, वासुदेव प्रसाद विधाता की कविताएँ और गज़लें बिम्बों की अन्तश्चेतनाओं की पूरी परत खोलने में पाठकों को साथ कर लेती हैं। उत्तम केशरी की अंगिका कविता की शुरूआत अच्छी है। अंचल की अन्य भाषाओं पर भी कविताएँ आनी चाहि; जैसे सूर्यापुरी, बंगला, मैथिली और उर्दू आदि।
    लघु कथाएँ, हास्य-व्यंग्य, आध्यात्मिक आलेख, बालदीप, दूर-दर्शन, सिनेमा स्तंभ की रचनाएँ भी पाठकों को आकर्षित करने में सक्षम है। इस अंक का महत्वपूर्ण पाठ- प्रबुद्ध लेखक इन्दुशेखर की है जिन्होंने चन्द्र किशोर जायसवाल के उपन्यास ‘पलटनिया’ पर अपनी पूरी गंभीरता और पारदर्शिता से विमर्श प्रस्तुत किया है।... सांवली का आवरण भी ‘सांवली’ की तरह मनमोहक है।
संपादकः डा. सुवंश ठाकुर ‘अकेला’, सिपाही टोला, चूनापुर रोड, पूर्णिया-854301. मोबाइल- 9973264550./ 9931465695.
 

सोमवार

’कोसी की नई जमीन' बनने को तैयार !


'कोसी की नई जमीन' का कविता खंड अब मुद्रण के लिए तैयार है। इसमें कोसी अंचल के 45 कवियों की कविताऍं संगृहीत हैं।
कोसी अंचल के युवा कवियों के समक्ष अपने अंचल के पूर्वज लेखकों की रचनात्मक विरासत और प्रतिमान हैं, वहीं दूसरी ओर आंचलिकता की विशिष्ट साहित्यधारा की जन्मभूमि होने के नाते विश्व स्तर पर प्रतिष्ठित उनकि लोकधर्मिता और कोसी की त्रासदी की प्रेरणा और प्रभाव है- वरिष्ट साहित्यकार विश्वनाथ प्रसाद तिवारी का यह मानना है कि आज के बाजारवाद लोकतंत्र में मिटते आदमी और चालाक सत्ता के शोषक रूप की तस्वीर भी इनमें प्रयाप्त है!
 संग्रह में शामिल कुल 45 कवियों के नाम इस प्रकार हैं -
कटिहार (13)- अनिमेष गौतम (बोकारो), आकाश कुमार (दिल्‍ली), कल्लोल चक्रवर्ती (दिल्‍ली), देवेन्द्र कुमार देवेश (दिल्‍ली), राकेश रोहित (कोलकाता), विभुराज चौधरी (दिल्‍ली), शेखर सुमन (बंगलूरु), संजीव कुमार सिंह, संजीव ठाकुर (गाजियाबाद), स्वर्णलता ‘विश्वफूल’, स्मिता झा (चाईंबासा), हरे राम सिंह, सुरेन्‍द्र कुमार सुपौल (12)- अखिल आनंद (सहरसा), अनुप्रिया (दिल्‍ली), कनुप्रिया (दिल्‍ली), किसलय ठाकुर (मुंबई), कुमार सौरभ (दिल्‍ली), नीरज कुमार (दिल्‍ली), पंकज चौधरी (मेरठ), मिथिलेश कुमार राय (सहरसा), रंजीत (रॉंची), रमण कुमार सिंह (दिल्‍ली), श्याम चैतन्य (गुड़गॉंव), राजेश चंद्र (दिल्‍ली) मधेपुरा (7)- अनुपम कुमार (दिल्‍ली), अमरदीप (पटना), अरविन्द श्रीवास्तव, उल्लास मुखर्जी, कृष्णमोहन झा (सिलचर), राजर्षि अरुण (शिमला), संजय कुमार सिंह (किशनगंज) पूर्णिया (7)- अरुण प्रकाश, गिरीन्द्रनाथ झा (कानपुर), रणविजय सिंह सत्यकेतु (इलाहाबाद), श्रीधर करुणानिधि (पटना), विनीत उत्‍पल (दिल्‍ली), अशोक कुमार 'आलोक', सुरेन्‍द्र कुमार 'सुमन' सहरसा (3)- अरुणाभ सौरभ (गुवाहाटी), आलोक रंजन (दिल्‍ली), शुभेश कर्ण (पटना)
अररिया (3)- चेतना वर्मा (जमशेदपुर), ठाकुर शंकर कुमार, मिथिलेश आदित्‍य
कोसी की नई जमीन: कविता खंड, संपादक: देवेन्‍द्र कुमार देवेश ( मोबाइल- 09868456153.), प्रकाशक - यश पब्‍लिकेशंस, नई दिल्‍ली। 

बुधवार

खुद की पीड़ा बांटने का प्रयास है ‘एक थी गीता’

‘एक थी गीता’ जवाहर किशोर प्रसाद की सरल-सहज बोलचाल की भाषा में रचितएक अत्यन्त संवेदनात्मक लघु-उपन्यास है। घनीभूत मानवीय संवेदना और करुणा के भाव से सिंचित यह उपन्यास रिश्तों की आत्मीयता को दर्शाता है। खास बात यह भी है कि इस रचना के कथा-क्रम में नायक की उपस्थिति गहरे रोमांचित करता है। ऐसा लगता है कि लेखक के पास रिश्तों के भावनात्मक चढ़ाव-उतार की समझ बूझ का एक समृद्ध अतीत है। शायद तभी नैसर्गिक प्रेम के रंगों को विरह-मिलन की कूची से कई प्रकार की प्रेम कहानियों की तस्वीरें पेश करने में इन्हें को असुविधा नहीें होती। अपने अनुभव, अनुभूतियों एवं कल्पनाओं की जीवंत रेखाओं से रचे कथानक में जो प्रतिविम्ब बनता है, वह बिल्कुल अपना-सा लगता है।
                                     - रामबहादुर कुमर (प्राचार्य) भागलपुर।

‘एक थी गीता’ सत्य घटना पर आधारित समाज की सच्ची कहानी है, जहां कथा-नायक यदा-कदा कहानी में उपस्थित होकर अपने दार्शनिक विचारों को संप्रेषित करता है, किन्तु बार-बार वह आकर कहानी से बाहर हो जाता है, स्वयं टिक नहीं पाता है, जिससे यह पता चलता है कि वह पात्रों के बीच रहकर अपने दुःखों में शामिल होना तो चाहता है किन्तु असह्य पीड़ा को देख नहीं सकने के कारण अपने दार्शनिक पुट छोड़कर प्लाट से बाहर हो जाता है।
    ‘एक थी गीता’  की कथा-वस्तु हमारे समाज की एक ऐसी अनकही कहानी है जो रोज-रोज घटती है हमारे सामने, किन्तु हम उन्हें अपनी जुबान पर लाने से हमेशा ही कतराते हैं।
                                                     - अशोक कुमार ‘आलोक’
                             संपादक- 'अर्य संदेश', मोबाइल- 9709496944.
लेखक- जवाहर किशोर प्रसाद
संपर्कः माधुरी प्रकाशन, सिपाही टोला, चूनापुर रोड, पूणिया - 854301
मोबाइल- 9905217237/9973264550.

   

अन्तःप्रेरणा की अभिव्यक्ति है कविता संग्रह ‘किसलय’

साहित्य में अच्छी संभावनाओं का नाम है डा. सुवंश ठाकुर ‘अकेला’ है। पचास कविताओं का संग्रह ‘किसलय’ नाम को सार्थक करता है। यह महज संयोग नहीं कि वाणी-वन्दना से प्रारंभ जीवन के सत्य जो साहित्य का भी सत्य है श्मशान पर पड़ाव डालती है कविता। बीच के सफर में शिव भी है, सुन्दर भी है।
    कविताओं की भाषा सरल, भाव-गंभीर है।
    श्री अकेला के ‘दो शब्द’ ने मुझे अधिक प्रभाविता किया है कि ये अपनी हांकने वाले कवि नहीं हैं। निन्दा, स्तुति, पाठकों के विवेक पर छोड़कर ये केवल कविताएं लिखते हैं। ‘किसलय’ के बारे में किसलय की ही ये दो पंक्तियां
उद्धृत कर मैं आश्वस्त हूँ कि इस छोटे-से शहर पूर्णिया का यह कवि नामवर होगा।
     ‘किसलय की शोभा न्यारी है,
    हर मनुज मात्र को प्यारी है।’’

 उम्र में ‘अकेला’ से बड़ा हूँ। सो, यशस्वी होने का आशीर्वाद देता हूँ
                                                    - भोलानाथ आलोक, पूर्णिया

पुस्तक से कविता की बानगी-
         सुकरात सरीखा जहर मिले
        शूली ईसा सा पा जायें
        हिरण्यकशिपु सा पिता मिले
        जाति मिले रैदास की         
        घोर यातना मीरा जैसी
        हो जाऊँ कबीरा सा फक्कड़

        ......
        .......
लेखक- डा. सुवंश ठाकुर ‘अकेला’
संपर्कः माधुरी प्रकाशन, सिपाही टोला, चूनापुर रोड, पूणिया - 854301
मोबाइल- 9905217237 / 9973264550.