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शनिवार

मैथिली विश्व की सर्वाधिक वैज्ञानिक भाषा। साहित्य अकादेमी के आयोजन में टूटी कुर्सियाँ - चली कुर्सियाँ! प्रथम दिवस का आयोजन संपन्न।

मिथिला के साहित्यिक एवं सांस्कृतिक उत्कर्ष में संत कवियों के अवदान विषय पर साहित्य अकादेमी, नई दिल्ली द्वारा समारोह एम.एल.टी. कालेज सहरसा के परिसर में (10-11 जून 2011.) आयोजित किया गया। आयोजन के प्रथम दिन उद्घाटन समारोह की अध्यक्षता मैथिली के चर्चित साहित्यकार डा. मायानंद मिश्र ने की। उन्होंने मैथिली भाषा को विश्व की सबसे वैज्ञानिक भाषा का दर्जा दिया। कार्यक्रम का  उद्घाटन बीएन मंडल विश्वविधालय के कुलपति डा. अरुण कुमार की अनुपस्थिति में सहरसा कालेज के प्राचार्य डा. राजीव कुमार ने किया। इस अवसर पर साहित्य अकादेमी के मैथिली प्रभाग के संयोजक डा. विद्यानाथ झा विदित ने अपने भाषण में साहित्य अकादेमी के मैथिली प्रभाग के क्रिया-कलाप तथा मैथिली साहित्यकारों के लिए किये जा रहे अनेक कार्यक्रमों की घोषणा की। उन्होंने कहा कि - हिमालय भारत का सर है तो मिथिला आँख है। उन्होंने इस आयोजन को मिथिला-मैथिली की एकता और समरसता को समर्पित बताया।साहित्य अकादेमी के विशेष कार्यक्रम पदाधिकारी जे. पोन्नुदुरै ने उपस्थित श्रोताओं एवं साहित्यकारों का अंग्रेजी में स्वागत किया। प्रथम सत्र की अध्यक्षता बी.एन. मंडल विश्वविधालय, मधेपुरा के अंग्रेजी विभागाध्यक्ष डा. ललितेश मिश्र ने की। इस अवसर पर संतशिरोमणी लक्ष्मीनाथ गोस्वामी विषयक आलेख पाठ करते हुए डा. रामचैतन्य धीरज, डा. तेजनारायण शाह, डा. हरिवंश झा एवं डा. रंजीत सिंह ने उनके व्यक्तित्व एवं कृतित्व पर प्रकाश डाला। इनके साथ ही डा. रवीन्द्रनाथ चैधरी इस संत की जीवन यात्रा को नक्शे पर दिखलाते हुए इनकी कृति पर विशेष प्रकाश डाला।
     द्वितीय एवं तृतीय सत्र संयुक्त रूप से संपादित किया गया। द्वितीय सत्र में भारती के आध्यात्मिक उत्कर्ष एवं तृतीय सत्र में लोकदेव कारू खिरहरि पर विशेष चर्चा हुई । द्वितीय सत्र की अध्यक्षता डा. भारती झा तथा तृतीय सत्र की अध्यक्षता डा. राजाराम शास्त्री ने की। द्वितीय सत्र में डा. लालपरी देवी, डा. भारती झा एवं डा. पुष्पम नारायण तथा तृतीय सत्र में डा. शिवनारायण यादव एवं डा. रामनरेश सिंह ने गवेष्णात्मक आलेख पाठ किये।
कार्यक्रम इस रूप में भी स्मरणीय रहा कि कमजोर कुर्सियाँ रहने की वजह से भारी शरीर वाले कई श्रोता व प्राध्यापकों का वजन यह नहीं सह सकी फलस्वरूप वे गिरे और कुर्सियाँ टूटी। ऐसा कई बार हुआ। साथ ही स्तरीय आलेख नहीं रहने की शिकायत सुनकर एक प्राध्यापक ने सभा वहिष्कार करने की चेष्टा की, हल्ला बोला और अध्यक्ष के विरूद्ध भड़ास निकाला। इसके पूर्व व्यवस्था को लेकर कर कई मैथिली प्राध्यापक आपस में भिड़ गये जिसे अकादमी के संयोजक डा. विदित ने शांत कराया।